अतृप्त मन की भग्न वीणा ,का करुण एक गान हो ।
खंडित हुए विश्वास की ,खोई मधुर मुस्कान हो ।
अपना समझने का भरम,पाले, छला मैने स्वयं को,
पर,छत पे उतरी धूप जाड़े, की, सी तुम महमान हो ।
#अनिल जैन उपहार कॉपीराइट