बस भरोसा न टूटे
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साय साय करती सड़कें
सुनसान पड़े चौराहे,
दूर रह कर जीने की विवशता
सिर्फ कुछ दिनों की परीक्षा है।
परीक्षा है हमारे सब्र की ,
हमारे अंदर बैठी करुणा की।
तो क्यों न ,
थोड़ा एकांत से प्यार करें
घर मे रहकर अपनों से अपनो सा व्यवहार करें,
बेजान हुए रिश्तों में नई जान डाल दे
धूल खाती किताबो की
थोड़ी धूल झाड़ दे।
वो दिन दूर नही हम फिर से
हाथों में हाथ ले
गाएंगे प्रेम के तराने।
यात्रा में बेखोफ करेंगे
एक दूजे के साथ जी भर कर संवाद।
बस थोड़ा सा संयम रख लें
रखले मन मे धीरज
की कुछ भी होजाए
हम सूखने नही देंगे संवेदना की सियाही,
टूटने नही देंगे सब्र का बांध।
फिर सूरज निकलेगा
फिर पंछी करेंगे कलरव
और हम जियेंगे ज़िंदगी
पहले की तरह।
बस कुछ दिन
आदत डाल लें घर मे रहने की,
कि बेजुबान भी कह उठे
ये आदमी कमबख्त अपनी पर आजाए तो हरा सकता है
हर महामारी।
डॉ अनिल जैन उपहार