Tuesday, August 31, 2021

मुक्तक(संशोधि)

जिंदगी जंग है तो जंग लड़ेंगे हम भी।

रिक्त जीवन में  कई रंग भरेंगे हम भी

किसी बंधन में बंधे हों  ये जरूरी तो नहीं 

राह कैसी भी हो पर संग चलेंगे हम भी ।

डॉ अनिल जैन उपहार

Monday, August 30, 2021

(जिंदगी)मुक्तक

जिंदगी जंग है तो जंग लड़ेंगे हम भी।
मन की कुंची से कई रंग भरेंगे हम भी।
ये जरूरी तो नही रिश्तों में बेमानी हो
राह कैसी भी हो पर संग चलेंगे हम भी ।

डॉ अनिल जैन उपहार

Wednesday, August 18, 2021

गीत (गीत गुनगुना रहा हूँ)

गीत गुनगुना रहा हूँ गीत बन के आइये।
देहरी पे फिर कोई नवगीत छेड़ जाइये।

मुक्तकों से है नयन छंद सजे अधरों पर।
गेसुओं पे सज रही घनाक्षरी भी झूम कर।
लक्षणा अभिधा जैसा रूप ओढ़ आइये
व्यंजना से स्वर मिले वो काफिया सजाइये।

गुरु लघु सा चित्र लिए रेखाए बता रही।
लय और ताल सी गति ह्रदय पटल पे छा रही।
दोहों और चौपाइयां सी तान लेके आइये।
पायलों की वो मधुर झनकार ले के आइये।

आभा स्वर्ण रश्मियों ने जो रखी कपोल पर।
गीतिका सी लग रही दो पाँखुरी अधर पर।
भोएँ अनुबंध लिख रही थी स्वप्न आइये।
नयनों के अनुप्रास पर गीत तो रचाईये ।

डॉ अनिल जैन उपहार

गीतिका

 दिल कहता है गीत सुनाऊ आ तुझको मन का मीत बनाऊ।

रिश्तों का उपमान बदलकर अलंकार से रीत बनाऊ।

माना छंद बना है जीवन चलन ज़माने का गहरा है।

आस अधूरी रही मिलन की उम्मीदों पर भी पहरा है।

मन देहरी पर अक्षत धर कर खूब करू मनुहार मनाऊ।

हृदय पटल पर शब्द धरु में सचमुच ऐसी प्रीत निभाऊं।

मन से मन का मिलन करा दे ऐसा कोई गीत सुनाऊ।


दर्द भी चुप अधरों से बोले नयनों के सब मौन इशारे।

कैसे कब तक राह निहारे ये सावन की मस्त फुहारें ।

आजाओ अब नेह पुकारे तुझको मितवा मीत पुकारे।

छंद तुम्ही नवगीत तुम्ही तुमसे ही हर बन्ध सजा रे।


डॉ अनिल जैन उपहार

मितवा(गीतिका)

दिल कहता है गीत सुनाऊ आ तुझको मन का मीत बनाऊ।
रिश्तों का उपमान बदलकर अलंकार से रीत बनाऊ।
माना छंद बना है जीवन चलन ज़माने का गहरा है।
आस अधूरी रही मिलन की उम्मीदों पर भी पहरा है।
मन देहरी पर अक्षत धर कर खूब करू मनुहार मनाऊ।
हृदय पटल पर शब्द धरु में सचमुच ऐसी प्रीत निभाऊं।
मन से मन का मिलन करा दे ऐसा कोई गीत सुनाऊ।

दर्द भी चुप अधरों से बोले नयनों के सब मौन इशारे।
कैसे कब तक राह निहारे ये सावन की मस्त फुहारें ।
आजाओ अब नेह पुकारे तुझको मितवा मीत पुकारे।
छंद तुम्ही नवगीत तुम्ही तुमसे ही हर बन्ध सजा रे।

डॉ अनिल जैन उपहार

Saturday, August 7, 2021

मित्रता दिवस(मुक्तक)

महक जाये धरा मन की मैं ऐसा इत्र लाया हूँ ।

अदब और संस्कारों से सजा वो चित्र लाया हूँ ।

डिगा सकते नही जिसको चलन भी दोगलाई के 

रखे महफूज़ दिल में राज़ ऐसे मित्र लाया हूँ ।

अनिल उपहार