Sunday, July 24, 2022

ओ बदरा (उम्मीद)

बड़े दयालु हो बदरा तुम
तुम नही देख सकते
इंतज़ार में पथराई आंखें
भले ही सब तुम्हें कोसने में 
लगे रहे,
तुमने उम्मीदों के शिलालेख पर
कर ही दिये हस्ताक्षर फुहारों के।
भिगो दिये
तपते अलसाये मिट्टी के 
जड़वत पड़े
खेत खलिहानों को।
लौटा दी फिर से चादर
हरीतिमा की।
बस ऐसे ही महरबानी बनाए रखना
और बरस जाना टूटी उम्मीदों को ज़िंदा रखने के लिए।

डॉ अनिल जैन उपहार

Thursday, July 14, 2022

ओ शिल्पी(कविता)

ओ शिल्पी 
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कोई नन्हा सा किरदार था 
वो रिश्तों के रंगमंच का ।
जीवन के सुख दुःख 
देखे थे बहुत करीब से उसने ।
एक शिल्पी सा तराशना चाहता था वो 
अनछुए पहलुओं कों ।
बनाना चाहता था 
पत्थर को भी भगवान ।
उसकी बातों में था 
अज़ीब सा सम्मोहन 
सादगी और लावण्य का 
पर्याय थी उसकी विनम्रता ।
अचानक आई वक़्त की 
तेज आंधी ने 
नफरत की ऐसी दिवार खड़ी करदी 
जिसने सारे तिलिस्म कों 
झकझोर कर रख दिया ।
किसी और दुनियां से आया 
वो किरदार 
गुमनाम बस्ती में कहीं खो गया 
शायद फिर से लौट आए वो शिल्पी 
और तराश जाये पत्थर को 
भगवान की तरह ............,

अनिल उपहार