काव्यांजलि
Wednesday, January 18, 2023
मन देहरी (मुक्तक)
अंतस की इस ऊहा पोह में कैसे दस्तक द्वार लगाऊँ ।
रूठ गयी अब मन देहरीभी कैसे वंदनवार सजाऊँ ।
स्मृति के अलसाये पन्ने और व्याकरण भी गहरा है
शब्दकोष विवश लगता है अब कैसे प्रतिमान जुटाउँ ।
--------अनिल उपहार -----
Wednesday, January 11, 2023
मुक्तक
एक पल तो वक़्त के सांचे में ढल कर देखिये ।
रंग जीवन के अधुरे फिरसे भरकर देखिये ।
ग़म के छितराए ये बादल एक दिन छंट जायेंगे ।
कुछ कदम तो साथ मेरे आप चलकर देखिये ।
----------अनिल उपहार ------
Monday, January 9, 2023
विश्व हिंदी दिवस पर( मुक्तक)
गरीबों की यह रोटी है अमीरों का निवाला है।
बन रसखान तुलसी सूर मीरा दिनकर निराला है।
रहे महलों में या हो झोपड़ी बेटों सा पाला है,
मां हिन्दी ने हम बेटों को दे आशीष ढाला है।
डा अनिल जैन उपहार
नेह की भाषा(मुक्तक)
चाहे ज़ख्म सहे होंगे, हर चोट नेह की भाषा है ।
तारे गिन गिन रात गुज़ारें ,जीवन की अभिलाषा है ।
दोराहे पर शब्द मौन है ,भोर खड़ी है द्वारे पर
रात यही कहती है दिन से ,घोर निराशा में आशा है ।
अनिल उपहार
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