काव्यांजलि
Thursday, March 20, 2025
न्यायालय के फैसले पर(मुक्तक)
माना न्यायपालिका पर खूब भरोसा करते सब।
तल्ख टिप्पणियों पर अपराधी औंधे मुंह गिर जाते तब।
ये कैसी परिभाषा गढ़ दी तुमने अपने फैसले की,
कैसे न्याय दिलाओगे इस बचकानी सोच से अब।
Thursday, March 13, 2025
कविता (विवशता(
विवशता
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जिंदगी की जंग में
हर बार मर जाती है
आत्मा
हार जाता है आदमी
अपना अस्तित्व बचाने की
लाचारी में ,
कल्पना के पंख
लगते है निगलने
वजूद के अवशेष।
अरमानों के शिखर
चढ़ जाते है भेंट
अति आधुनिकता की होड़ में।
विवश हृदय
हर बार घरौंदे को बचाने की
जुगत में पी जाता है
लहू के घूंट
और बिखरे हुए तिनकों को
एक जुट करने की
जद्दोजहद में ,
करने लगता है अपनी सांसों की
टूटती गति से
जड़वत होते रिश्तों में
प्राण फूंकने की
असफल कोशिश ।
लेकिन अपनापन बौना हो
कर देता है समर्पण
देह की असीमित परिधि में,
नया पाने की चाह और पुराना
छोड़ देने की होड़ में खुद कों ।
आँगन में खड़ा बुढा बरगद
लाचार हो देख रहा है
आँगन से अपनी विदाई का
मुहूर्त।।।।।
डॉ अनिल जैन उपहार
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