Thursday, November 27, 2025

कविता मनुष्य भव

स्वार्थ की दहलीज पर
नहीं जलते है दीप
चाहत की बाती से।
पल पल छोटी होती
अपनेपन की चादर
समेट लेती है 
जीवन का कुहासा
किसी हारे हुए
पथिक की तरह।
उम्मीदें दम तोड़ देती है
तवायफ के घुंघरू की तरह
बदहवास रिश्तों की पायल 
खो चुकी है सारे स्वर
शायद यही है मनुष्य भव की
दुर्दशा।।।।।।

डॉ अनिल जैन उपहार

Monday, November 3, 2025

गीत

मेरे गीतों को स्वर अपने देदो प्रिए 
मन की वीणा कभी फिर बजे न बजे।
प्रीत का फिर घरौंदा सजाओ शुभे वंदन वारे कभी फिर सजे न सजे।

मैने पूजा तुम्हे देवता मानकर अर्घ्य गीतों के अबतक चढ़ाता रहा।
मन के दीपक में सांसों की बाती लिए नेह की ज्योत अबतक जलाता रहा।
भावना के जो रख लो अधर पर कलश,
मन के मंदिर में दीपक जले ना जले।

मैं अंधेरों से लड़ता रहा उम्र भर 
और उजाले मुझे ढूंढ ते ही फिरे।
वो मेरे स्वप्न में कल भी आया था पर स्मृति के पटल पर थे बादल घिरे।
ये अंधेरों की चादर समेटो प्रिए 
मन के मंदिर में दीपक जले ना जले।

प्रीत की झील में फिर खिले है कमल
मन का उपहार है जो लिखी ये गजल।
गेसुओं का ये पर्दा हटाओ प्रिए 
मद भर ये नयन फिर मिले ना मिले।

ज्योत जब भी जली नेह के दीप की
आंधियां ग़म की उसको बुझाती रही।
मैं पुजारी हुआ रस्म ऐसी रही मेरी पूजा तुम्हे नित बुलाती रही।
वंदना में अब हाथों को जुड़ जाने दो
अर्चना के ये दीपक जले ना जले।

Saturday, November 1, 2025

गीत

एक गीत आपकी अदालत में 
,,,,,,

मैं उड़ना चाहता हूं पंख को परवाज़ देना तुम।
मेरे हर गीत को अपनी मधुर आवाज देना तुम।

लगे गर वक्त जब छलने मेरा आधार बनना तुम।
मेरे सूने से जीवन का हंसी संसार बनना तुम।
विरह के गीत गाऊ तो सुरीला साज देना तुम।
मेरे हर गीत को अपनी मधुर आवाज़ देना तुम।

कली तुमको लिखा मैने तो भंवरा जल गया मुझसे।
तुम्हे मैं ज्योत लिख बैठा पतंगा अड गया मुझसे।
लिखे जो ख़त तुम्हे मैने न उनका राज़ देना तुम।
मेरे हर गीत को अपनी मधुर आवाज़ देना तुम।

सृजन की तुम हो उपमाएं तुम्ही अनुप्रास जीवन का।
तुम्ही नवगीत हो मेरा तुम्ही हर छंद यौवन का।
चढ़ाऊं अर्घ्य शब्दों के नया अंदाज़ देना तुम।
मेरे हर गीत को अपनी मधुर आवाज़ देना तुम।

डॉ अनिल जैन उपहार