-------माँ -------
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तुमने संस्कारों के बीज रोंप
संघर्षो के झंझावत और
असहनीय पीड़ा भोगते हुए
लगाया था जो बिरवा ,
आज पल्लवित और पुष्पित होते देख
मन ही मन प्रसन्न होती थी तुम |
माँ !
तुम्हारी दुआओं के असर ने
चमन कों महकाया, खुशनुमा बनाया |
खुद उलझी रही पुरातन परम्पराओं, मर्यादाओं
के बंधन में |
ना कोई इच्छा, आकांक्षा, शिकायत |
बस देखना चाहती थी तुम,
अपने त्याग और समर्पण में, अपने अस्तित्व कों बनाये रखना |
अपनी तपस्या के समुचित फल से घर आँगन कों
महकते देखना |
माँ भोर की प्रथम किरण के साथ, आशीषों में उठने वाले
तुम्हारे हाथ,
नित नई प्रेरणा, ऊर्जा और स्फूर्ति देते थे |
आज जब तुम नही हो तो ढूंढता हूँ मै तुम्हें शून्य में |
और याद करता हूँ
आटा सने तुम्हारें हाथ चौका चूल्हा करते तुम्हारा साथ,
तुम्हारे चेहरे की झूर्रियो में छिपी उस जन्नत कों
जिसने दिया घर द्वार,आत्म विश्वास और संस्कार |
आज तुम्हारी कमी ने हमे ,
बना दिया है बेसहारा, बेजान और अनाथ |
कहने कों अब नहीं हो लेकिन, है तुम्हारी
दुआओं का, अहसास, विश्वास और प्रकाश
हे माँ !
तुम्हारी रिक्तता अब नहीं भर पायेगी मन के सुने पन कों |
उगासी और संस्कारों के स्पंदन कों |
लेकिन
तुम्हारी दुआओं के दीप जग मगाऐगे, रोशन करेगें
सूनी राहों कों,प्रकाशित करेंगे, उदास हवाओं कों
काश ! मै समझ पाता माँ हो ने की परिभाषा
और लिख पाता एक महाकाव्य तुम पर |
मेरे गीत और छंद पुकारते है तुमको
लेकिन मै जानता हूँ की तुम कभी नही लौटोगी उस यात्रा से
हे ! ममतामयी, देवी स्वरूपा, वात्सल्य मूर्ति माँ !
तुम्हें अनन्त प्रणाम ||
--------6 फरवरी 2007 पुण्य तिथि पर प्रकाशित -----------
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तुमने संस्कारों के बीज रोंप
संघर्षो के झंझावत और
असहनीय पीड़ा भोगते हुए
लगाया था जो बिरवा ,
आज पल्लवित और पुष्पित होते देख
मन ही मन प्रसन्न होती थी तुम |
माँ !
तुम्हारी दुआओं के असर ने
चमन कों महकाया, खुशनुमा बनाया |
खुद उलझी रही पुरातन परम्पराओं, मर्यादाओं
के बंधन में |
ना कोई इच्छा, आकांक्षा, शिकायत |
बस देखना चाहती थी तुम,
अपने त्याग और समर्पण में, अपने अस्तित्व कों बनाये रखना |
अपनी तपस्या के समुचित फल से घर आँगन कों
महकते देखना |
माँ भोर की प्रथम किरण के साथ, आशीषों में उठने वाले
तुम्हारे हाथ,
नित नई प्रेरणा, ऊर्जा और स्फूर्ति देते थे |
आज जब तुम नही हो तो ढूंढता हूँ मै तुम्हें शून्य में |
और याद करता हूँ
आटा सने तुम्हारें हाथ चौका चूल्हा करते तुम्हारा साथ,
तुम्हारे चेहरे की झूर्रियो में छिपी उस जन्नत कों
जिसने दिया घर द्वार,आत्म विश्वास और संस्कार |
आज तुम्हारी कमी ने हमे ,
बना दिया है बेसहारा, बेजान और अनाथ |
कहने कों अब नहीं हो लेकिन, है तुम्हारी
दुआओं का, अहसास, विश्वास और प्रकाश
हे माँ !
तुम्हारी रिक्तता अब नहीं भर पायेगी मन के सुने पन कों |
उगासी और संस्कारों के स्पंदन कों |
लेकिन
तुम्हारी दुआओं के दीप जग मगाऐगे, रोशन करेगें
सूनी राहों कों,प्रकाशित करेंगे, उदास हवाओं कों
काश ! मै समझ पाता माँ हो ने की परिभाषा
और लिख पाता एक महाकाव्य तुम पर |
मेरे गीत और छंद पुकारते है तुमको
लेकिन मै जानता हूँ की तुम कभी नही लौटोगी उस यात्रा से
हे ! ममतामयी, देवी स्वरूपा, वात्सल्य मूर्ति माँ !
तुम्हें अनन्त प्रणाम ||
--------6 फरवरी 2007 पुण्य तिथि पर प्रकाशित -----------
BAHUT HI SUNDAR AUR MARMSPARSHI KAVITA HAI.... SHUBHKAMNAYEn
ReplyDeleteaapki hosla afjai ke liye dilse aabhar aapka |ummeed hai apka sneh bana rhega
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