Wednesday, February 5, 2014

-------माँ -------
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तुमने  संस्कारों  के  बीज  रोंप

संघर्षो  के  झंझावत  और  

असहनीय  पीड़ा  भोगते  हुए 

लगाया  था  जो  बिरवा ,

आज  पल्लवित  और  पुष्पित  होते  देख 

मन  ही  मन  प्रसन्न  होती  थी  तुम  |

                 माँ !

तुम्हारी  दुआओं  के  असर  ने  

चमन  कों  महकाया, खुशनुमा  बनाया  |

खुद  उलझी  रही  पुरातन  परम्पराओं, मर्यादाओं 

         के बंधन     में  |

ना  कोई  इच्छा,   आकांक्षा,  शिकायत  |

बस  देखना  चाहती  थी  तुम, 

अपने  त्याग  और  समर्पण  में, अपने  अस्तित्व  कों  बनाये  रखना  |

अपनी  तपस्या  के  समुचित  फल  से  घर आँगन  कों 

                महकते  देखना  |

माँ  भोर  की प्रथम  किरण  के  साथ, आशीषों  में  उठने वाले 

             तुम्हारे हाथ,

नित  नई प्रेरणा, ऊर्जा  और  स्फूर्ति  देते  थे |

आज  जब  तुम  नही  हो  तो ढूंढता  हूँ  मै  तुम्हें  शून्य  में |

              और  याद  करता  हूँ 

आटा   सने  तुम्हारें हाथ चौका  चूल्हा  करते  तुम्हारा  साथ,

तुम्हारे  चेहरे  की  झूर्रियो  में  छिपी  उस  जन्नत  कों 

जिसने  दिया  घर   द्वार,आत्म  विश्वास  और  संस्कार |

आज  तुम्हारी  कमी  ने हमे ,

बना दिया है बेसहारा,  बेजान और  अनाथ |

कहने  कों  अब  नहीं हो  लेकिन, है तुम्हारी 

दुआओं का, अहसास, विश्वास  और प्रकाश 

  हे माँ  !

तुम्हारी  रिक्तता  अब नहीं  भर  पायेगी  मन के सुने पन कों |

उगासी  और  संस्कारों  के स्पंदन  कों |

लेकिन 

तुम्हारी  दुआओं  के  दीप  जग मगाऐगे,  रोशन  करेगें

सूनी  राहों  कों,प्रकाशित  करेंगे, उदास  हवाओं कों 

काश ! मै  समझ  पाता  माँ  हो  ने  की  परिभाषा 

और  लिख  पाता  एक  महाकाव्य  तुम  पर |

मेरे  गीत  और  छंद  पुकारते  है  तुमको 

लेकिन  मै जानता  हूँ  की  तुम कभी  नही लौटोगी  उस  यात्रा  से 

हे  ! ममतामयी, देवी  स्वरूपा, वात्सल्य मूर्ति  माँ  !

तुम्हें  अनन्त प्रणाम  ||

--------6 फरवरी 2007 पुण्य तिथि पर प्रकाशित -----------


2 comments:

  1. BAHUT HI SUNDAR AUR MARMSPARSHI KAVITA HAI.... SHUBHKAMNAYEn

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  2. aapki hosla afjai ke liye dilse aabhar aapka |ummeed hai apka sneh bana rhega

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