रहा न मन का धीर कहो अब कैसे कोई गीत लिखूँ ।
छंदों के क्रंदन वंदन में कैसे मन का मीत लिखूँ ।
आवागमन नियति है जग की स्थिरता मीठा भ्रम है
तुमको पाकर सब कुछ भूला हार लिखूँ या जीत लिखूँ ।
-----------@अनिल उपहार ----
छंदों के क्रंदन वंदन में कैसे मन का मीत लिखूँ ।
आवागमन नियति है जग की स्थिरता मीठा भ्रम है
तुमको पाकर सब कुछ भूला हार लिखूँ या जीत लिखूँ ।
-----------@अनिल उपहार ----
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