दुःख की बदली छा जाती तब
गीत विरह के गाती है ।
अमराई को कोयल तरसे ।
सूनी सेज जलाती है ।
महंदी हाथों की सिसक रही ।
महावर भी शर्माती है ।
पछुआ के अनुरागी सुन रे ।
पुरवा तुझे बुलाती है ।
--------अनिल उपहार -------
गीत विरह के गाती है ।
अमराई को कोयल तरसे ।
सूनी सेज जलाती है ।
महंदी हाथों की सिसक रही ।
महावर भी शर्माती है ।
पछुआ के अनुरागी सुन रे ।
पुरवा तुझे बुलाती है ।
--------अनिल उपहार -------
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