विरह के दोहे
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विरह यातना शरद की ,सखियों का श्रंगार ।
बिना मिलन कैसे थमे ,स्मृतियों का ज्वार ।
पौष मास दिन धूजणी,हाड कंपाती रात ।
बिन सजना नैना करे,गौरी के बरसात ।
दंश लीलते स्मृतियों के,गौरी का सुख चैन ।
मौसम भी निष्ठुर हुआ ,गीले रहते नैन ।
--------अनिल उपहार --------
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विरह यातना शरद की ,सखियों का श्रंगार ।
बिना मिलन कैसे थमे ,स्मृतियों का ज्वार ।
पौष मास दिन धूजणी,हाड कंपाती रात ।
बिन सजना नैना करे,गौरी के बरसात ।
दंश लीलते स्मृतियों के,गौरी का सुख चैन ।
मौसम भी निष्ठुर हुआ ,गीले रहते नैन ।
--------अनिल उपहार --------
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