काव्यांजलि
Thursday, September 3, 2015
काव्यांजलि
हमने खाई थी कसम लौट के ना आने की ।
तेरी महफिल से सरे राह चले जाने की ।
अजीब सी थी कशिश तेरी हँसी चितवन में
मै तो मुजरिम था सजा पाई उस फ़साने की ।
---------अनिल उपहार ------
काव्यांजलि
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