लिखी पाती ये असुवन से सजन तुम लौट आना फिर ।
तेरे चरणों की हूँ दासी न इतना भूल जाना फिर ।
तेरे हर फ़र्ज़ को दिल से सलामी देती हूँ सुनले
मेरे इस प्यार के आगे न अपने पग डिगाना फिर ।
--------अनिल उपहार -----
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