अम्बर भी धोने लगा चरण धरा के आज ।
पावस का ख़त पढ़ चला खोल पपीहा साज ।
नित परिधान बदल रहा देखो बादल आज ।
बून्द बून्द ने छेड़ दिए मन के सारे साज ।
अनिल उपहार
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