राह निहारते व्याकुल नयना
बाट जोहती मन देहरी
अधरों पर छाई ख़ामोशी
क्या तुमको नही दिखती ।
ओ प्रियतम
उदास पड़े सावन के झूले
काहे को विरहन को भूले ।
सिसक रही हाथों की महंदी
बेबस तुम बिन तीज भी
और मैं
तक रही हूँ हर और से आती आहट को
कि लौट आओगे तुम
और भर लोगे अपने आगोश में ।
बस प्रतीक्षा में तुम्हारी
लिख रही हूँ
मन के कोरे पृष्ठों पर
विरह के गीत
कि आओगे तुम
और दोगे उन्हें अपने स्वर ।
अनिल उपहार
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