आज धूमिल हर स्वप्न हो गया बापू तेरे देश का ।
शर्मसार है ज़र्रा ज़र्रा आधुनिक परिवेश का ।
मानवता की लाश लिए वो खुद कांधे पर निकल पड़ा
देख रहा आवाम यहाँ अंजाम सियासी ऐश का ।
अनिल उपहार ।।।।।
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