अपलक निहारती
क्षितिज के उस पार
बीते हुए साल की
सहेजी हुई यादों कों
खामोशियों की पगडंडी ।
शीत में उष्णता का
अहसास कराती
तेरे चुपचाप चले जाने की वज़ह ।
और मैं
नन्हें से किरदार की तरह
रिश्तों के रंगमंच पर
कर रहा होता हूँ
मिलन के अदभुत पलों का
जिवंत अभिनय ।
अनिल जैन उपहार
No comments:
Post a Comment