गुज़रे लम्हों के साये में बैठे मन में आंच लिए ।
ख़त तुमने लिक्खे थे जो भी अक्षर अक्षर बांच लिए ।
धुंधली होगई सारी लिखाई और स्याही भी थी फीकी
नज़रों ने सारे ही उत्तर एक पल में ही जांच लिए ।
अनिल जैन उपहार
No comments:
Post a Comment