Saturday, January 7, 2017

कविता(महिला दिवस पर)

महिला दिवस पर
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यूँ कहने कों तो हर बार कराते रहे
मेरी महानता का बोध ।
पढ़ाते रहे भरोसे का पाठ
पर खुद नहीं कर पाए भरोसा मुझ पर
हर बार मेरे अस्तित्व पर लगाते रहे
प्रश्न चिन्ह ।
करते रहे मेरे वज़ूद को तार तार ।
जबकि जानते थे तुम कि
छली गयी हूँ मैं
शब्दों के मरहम से भुनाई जाती रही हूँ मैं ।
तुम ही गढ़ते रहे उपमान
सजाते रहे प्रतिमान
अपनी शब्दावलियों से ।
मैं थामे रही रिश्तों का व्याकरण
निभाती रही अपना धर्म
इस उम्मीद से कि तुम बनोगे मेरे विशवास
की बैसाखी
दोगे वही ओहदा सम्मान
जिसे गाते रहे हो तुम
अपने गीतों और कविताओं में
दे पाओगे ???????????

------अनिल उपहार ----/

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