कविता लेती है जन्म
गाँव के मुहानो पर
कविता पाती है आकार
झोपड़ियों के उड़ते गुबार में ।
कविता होती है साकार
सड़क पर जन्म देती माँ से
कविता निखरती है
असहाय और लाचार माँ के सीने में
कविता संवरती है
भूख से व्याकुल
बिलखते बचपन की सहजता से ।
कविता बिलखती है
अपनों से शर्म सार होते
रिश्तों
और मर्यादा की अर्थी को
ढोते हुए ।
कविता खोजाती है अपना वजूद -
किसी की अस्मत को
तार तार होता देख
जब मौन होजाते है स्वर
नि:शब्द होजाता है मन
घायल हो जाती है लेखनी
लाचार होजाती है कलम ।
तब मर जाती है
कवि की आत्मा और
बच जाते है कुछ स्वप्न
फिरसे नई कविता को जन्म देने ।
अनिल उपहार ---------
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