कह रहा अब नोट बंदी पर यहाँ आवाम है ।
मजलूमों की भीड़ में अलसायी सुबहो शाम है ।
होगये मुंह से निवाले दूर अब तो रूठकर
मुफलिसी के दौर में सच ज़िन्दगी इलज़ाम है ।
अनिल उपहार
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