Thursday, February 2, 2017

कविता (नियति)

नियति ।।
।।।।।।।।
कभी रवायतों की बेड़ियों में
जकड़ी
तो कभी झुलसती रही
मर्यादा की चौखट पर ,
जबकि जानते थे सब
बिना संवादों की धूप के
सर्द होजाते है रिश्ते ।
अहसास को रहन रख
हर बार बुनती रही
मौन की तिलिस्मी चादर ।
बस संस्कारों की दुहाई दे
चुप कराई जाती रही ,
ओढ़ाकर शालीनता का दुशाला ।
और द्विअर्थी टिप्पणियों को झेल
बुहारती रही ,
अपने ऊपर लगी निरर्थक
इल्ज़ामों की धूल ।
ज़माने की पीर को
चुपचाप सह जाना ।
अपनों से हर बार
छले जाना ।
नियति बन चुकी थी ।
यह सोंच कि -
मुझे करने है रोशन
दो जहाँ
तभी तो हर बार ,
देहरी के दीप सी जलती रही
घुटन का सैलाब अंतस में लिये
अश्कों कों पीती रही ।
मुझे गढ़नी है
संस्कारों की पाठशाला
और सिखाना है ,
मेरी खुद की जाई कों
फिर से यही सब कुछ
सहने का सबक ।

अनिल उपहार

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