Thursday, February 16, 2017

मुक्तक (दुहाई दे के रस्मों की )

दुहाई दे के रस्मों की वो दामन छोड़ जाता है ।

भिगो कर रोज़ ही पलकें वो सावन छोड़ जाता है ।

बड़ी शिद्दत से उसके आगमन की चिर प्रतीक्षा थी

दिलासा दे के उम्मीदों का दर्पण तोड़ जाता है ।

अनिल जैन उपहार

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