Saturday, April 29, 2017

कविता(अहसास)

याद है अबतक कि,
संस्कारों की सड़क के
मुसाफिर थे तुम ।
भौतिकता की अट्टालिका
रास नही आती थी कभी
और ना ही कभी झूठा दम्भ
विचलित कर पाया तुम्हे ।
पाप और पूण्य के खेल में
हर बार भारी होता गया
पलड़ा ,दोगली मानसिकता का
जो तोलना चाहता था
तुम्हारे स्वाभिमान को ।
तुमने हार कहाँ मानी
बस स्वीकार कर लिया
मन का एकाकीपन
सृजन की असीमित संभावनाओ ने
बना लिया तुम्हे आश्रय स्थल,
और तुम
सिखाते रहे ज़माने को
जीवन जीने की कला
हां यही हुनर कोई चुरा नही पाया
तुमसे आज तक ।

अनिल जैन उपहार

Tuesday, April 25, 2017

उम्मीद (कविता)

वक़्त के हाथों मज़बूर होती ज़िन्दगी
और हाशिये पर आ ठहरे
मन के सुनहरे स्वप्न
तलाशते
उमंगों के सोये
उनींदी घरोंदे ,
जहाँ वीरान पड़े
हसरतों के भव्य
धराशाही महल
जो थे हमारे नही
पर ,
एक उन्मुक्त
आसमां में विचरण करते
कल्पना के पंखों पर ,
अंतहीन पीड़ा को सहेजे
किसी अमूल्य धरोहर से
प्रतीत होते हसरतों के
शिलालेख ।
जिस पर उत्कीर्ण है
तुम्हारे नाम के स्वर्ण अक्षर
जिसे बांच बांच
ह्रदय किसी चिर परिचित
अहसास से हो उठता है
रोमांचित ।
कि तुम कहीं किसी मोड़ पर
कर रहे होंगे प्रतीक्षा
और कलरव करते
पक्षियों के झुण्ड
होंगे साक्षी हमारे मिलन के
उन अदभुत पलों के ।
शायद ,
लौट आये कोई फिर से
किसी गुमनाम बस्ती से
और कर जाये
भोर की पहली किरण पर
आगमन के हस्ताक्षर ।
प्रतीक्षा में बाट जोहती
मन देहरी ।

अनिल जैन उपहार

Monday, April 24, 2017

रिश्ता(कविता)

मलयानिल की मन्द समीर
जब छूकर गुज़रती है
उसके अहसास को
तो मन
एक अज़ीब सी गंध से
महक उठता है ।
रूप और लावण्य
गूँथ देते है उसकी विनम्रता को
अभिमंत्रित माल में
रिश्तों को सहेजने का हुनर
बखूबी आता है उसे
तभी तो मन उसके प्रति
भर जाता है अटूट श्रद्धा से ।
सारे गीत और छंद
अर्घ बन चढ़ जाते है उसके चरणों में
श्रद्धा की ओ पावन प्रतिमा
तुम्हे व्याकरणी पैमाने
नाप नही सकते ।
शब्द शब्द निखर उठते है
पा तुम्हारा सानिध्य ।
कविता रच देती है
सम्बन्धो का नया दिनमान ।

अनिल उपहार

मुक्तक (शहीद)

लहू से सींचकर जो चल दिये पहचान लिख देना ।

वो पहली रात सूनी सेज का अरमान लिख देना

मुनिया राह तकते सो गयी आये नही पापा

जिसका छिन गया बचपन खोई मुस्कान लिख देना ।

अनिल जैन उपहार

Thursday, April 20, 2017

मुक्तक

तुझसे तकरार भी करूँ तो मैं करूँ कैसे ।

तुझपे ऐतबार भी करूँ तो मैं करूँ कैसे ।

वक़्त की ठोकरों से टूटना तो लाज़िम था

तुझसे इज़हार  भी करूँ तो मैं करूँ कैसे ।

अनिल जैन उपहार