Tuesday, April 25, 2017

उम्मीद (कविता)

वक़्त के हाथों मज़बूर होती ज़िन्दगी
और हाशिये पर आ ठहरे
मन के सुनहरे स्वप्न
तलाशते
उमंगों के सोये
उनींदी घरोंदे ,
जहाँ वीरान पड़े
हसरतों के भव्य
धराशाही महल
जो थे हमारे नही
पर ,
एक उन्मुक्त
आसमां में विचरण करते
कल्पना के पंखों पर ,
अंतहीन पीड़ा को सहेजे
किसी अमूल्य धरोहर से
प्रतीत होते हसरतों के
शिलालेख ।
जिस पर उत्कीर्ण है
तुम्हारे नाम के स्वर्ण अक्षर
जिसे बांच बांच
ह्रदय किसी चिर परिचित
अहसास से हो उठता है
रोमांचित ।
कि तुम कहीं किसी मोड़ पर
कर रहे होंगे प्रतीक्षा
और कलरव करते
पक्षियों के झुण्ड
होंगे साक्षी हमारे मिलन के
उन अदभुत पलों के ।
शायद ,
लौट आये कोई फिर से
किसी गुमनाम बस्ती से
और कर जाये
भोर की पहली किरण पर
आगमन के हस्ताक्षर ।
प्रतीक्षा में बाट जोहती
मन देहरी ।

अनिल जैन उपहार

No comments:

Post a Comment