Wednesday, June 28, 2017

मुक्तक( तुम न बदल जाना)

मै समर्पण लिखूं अहसास बन तू ढल जाना ।

दिल के सागर में तू दरिया सी बन मचल जाना ।

मेरी सांसों में समाया है तू धड़कन बन कर

चाहे बदले ये ज़माना न तुम बदल जाना ।
अनिल जैन उपहार

Saturday, June 24, 2017

कविता(आभासी दुनियाँ)

पल पल प्रतिपल
तंग होती
संवेदना की चौखट ।
और विस्तार पाता
स्वार्थ का गहरा आयतन ,
ऊपर से अपनी मज़बूत जड़े पसारता
आभासी दुनियां का
मकड़ जाल ।
संचार क्रांति की भेंट चढ़ता
बचपन
कभी अपनों से बैठ कर
बतियालिया होता
बूढ़े माँ बाप की कुछ उम्र
बढ़ जाती ।
हम वही तो बो रहे है
जिसे काटना है
हमारे अपने अंश को
सौपने के लिए वही सब
जो हमने अपनो को
दिया है ।।।।।
अनिल उपहार

Thursday, June 22, 2017

कविता(भागदौड़)

अपार संभावनाएं तलाशता जीवन
लोकप्रियता के
भीड़ भाड़ वाले चौराहो पर
रुकना नही चाहता ,
भौतिकता के  मद्धिम प्रकाश में
रिश्तों का सेतु ,
फिजूल लगने लगता है उसे ।
क्या यही मानसिक शांति है ?
यह भटकाव
क्षणिक सुख तो दे सकता है
पर वो सुकून नही
जिसे तुम खोज रहे हो
बरसों से ।

अनिल उपहार

Monday, June 19, 2017

कविता(चुनोती)

भले ही वक़्त से लड़ना सीख लिया तुमने
गरल तन्हाई का
पीना भी
सीख लिया तुमने ।
जटिल प्रश्न
पल भर में हल कर गए
शिकस्त जब भी मिली
खुद अश्क पिये
और ज़ख्मों को
चुपचाप सिल गए ।
यह शिल्प कहाँ से लाए तुम
हर शाख इस कारीगरी से
हैरान है ,
शायद दर्द पल भर का
मेहमान है ।

अनिल जैन उपहार

Friday, June 16, 2017

कविता(सम्मोहन)

एक अजीब सा सम्मोहन था
उसकी बातों में ,
उसका हर्फ़ हर्फ़
अदबी इतिहास की
गवाही सा प्रतीत  होता
था ।
उसकी लेखनी
छंद बन गीतों में ढल जाया
करती थी ।
संस्कारों की पाठशाला का
कुशल विद्यार्थी था वो ।
अवसाद के बादल
कभी बरस नही पाए थे
उसके आँगन में ।
संवेदना के दो चार छीटें ही
काफ़ी थे उसके
किसी की पीड़ा को
हर लेने के लिए ।
थोती विरदावलियाँ
भाती ही नही थी उसे ।
शायद यही अच्छाइयां
हर बार थोप देती थी
प्रश्न चिन्ह
उसकी कार्यशैली पर ,
ओर वो होजाता था निशब्द
अपनी बेगुनाही के
सबूत जुटाने में ।

अनिल जैन उपहार

Thursday, June 15, 2017

कविता,(एकाकीपन)

अज़ीब भटकाव है न
रिश्तों के दरमियाँ
बुलंदी हमे अहसास
नहीं होने देती
किसी को अपना बना लेना
या किसी का बन कर रह जाना।
शोहरत का हिमाला
ओर कामयाबी की मीनारे,
ऊँचा तो उठाती है
पर कहीं हमे इंसानी
जज़्बातों से गिरा न दे
जरूरत है तो बस
संबंधों के भव्यमहल पर
अपनेपन की आधारशिला
रखने की ।
तभी सार्थक होगा
तुम में मै ओर
मुझमे तेरे होने का
जीवंत अहसास
जो दूर कर पाएगा
मन के एकाकीपन
की खाई को ।

अनिल जैन उपहार

Tuesday, June 13, 2017

अन्नदाता (मुक्तक)

मेरे देश का अन्नदाता

भूखा रहके भी सबुरी से काम लेता है ।

ओढ़कर बेबसी ज़िल्लत के जाम लेता है ।

रहन है जिसकी जवानी बुढापा कर्जे में

हँस के पुरखों की विरासत वो थाम लेता है ।

अनिल जैन उपहार

बचपन(मुक्तक)

सारे डर माँ के वो आँचल में छुपा लेता है ।

तंग भी करता है पर सबको हँसा देता है ।

वो भी क्या दौरे मुहब्बत का हंसी लम्हा था

याद करता हूँ तो बचपन का पता देता है ।

अनिल जैन उपहार

Thursday, June 8, 2017

मुक्तक ,(नही की जाती,,)

बे वफाओ से वफादारी नही की जाती ।
थोती बातो से कलाकारी नही की जाती ।
जो हकीकत है बयां करना घर्म है अपना
हमसे तो धर्म से गद्दारी नही की जाती ।
अनिल जैन उपहार

Sunday, June 4, 2017

कविता,,(हुनर)

कामयाबी का गुरु शिखर था वो
रिश्तों का शब्दकोश
बड़ा समृद्ध था
उसका
पत्थर को तराश
हीरा बना देने की कला भी
बखूबी आती थी उसे ।
तभी तो
अच्छे और बूरे का भेद
जान नहीं पाया कभी
वैचारिक दक्षता भी
ज़बरदस्त थी उसमें
तभी तो ज़माने की
नज़र से देख लेने का
सलीका रास आगया था उसे ।
शायद वक़्त की तेज आंधी ने
सिखा दिया था उसे
बिखर कर संभलने का चलन ।

अनिल उपहार