Friday, February 15, 2019

पुलवामा की घटना पर

रक्त रंजीता देख के माँ को हर कोई शर्मिंदा है ।

कैसे अपना कह दें उसको ,जो रहा सदा दरिंदा है।

कितनी लाशें और ढोएंगे पूछ रहा है तिरंगा,

बूढ़ी सांसे सिसक रही है ,लेकर आंखों में गंगा ।

हिमगिरि मौन खड़ा कबसे,घायल माता रोती है ।

देख शहादत वीरों की,हर आस खोखली होती है ।

पुलवामा के ओ जाबांजो,बलिदान व्यर्थ नही जायेगा।

इतने शीश उतारेंगे हम ,वो सोच सोच थर्राएगा ।

अनिल जैन उपहार

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