रक्त रंजीता देख के माँ को हर कोई शर्मिंदा है ।
कैसे अपना कह दें उसको ,जो रहा सदा दरिंदा है।
कितनी लाशें और ढोएंगे पूछ रहा है तिरंगा,
बूढ़ी सांसे सिसक रही है ,लेकर आंखों में गंगा ।
हिमगिरि मौन खड़ा कबसे,घायल माता रोती है ।
देख शहादत वीरों की,हर आस खोखली होती है ।
पुलवामा के ओ जाबांजो,बलिदान व्यर्थ नही जायेगा।
इतने शीश उतारेंगे हम ,वो सोच सोच थर्राएगा ।
अनिल जैन उपहार
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