आज मातृ दिवस पर
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कहने को तो अनपढ़ थी वो
पर ,
सबको पढ़ लेने का अज़ीब सा
हुनर था उसमें,
संस्कारों के समृद्ध विश्वविद्यालय की
कुशल प्राध्यापक थी वो।
पत्थर को तराश कर
हीरा बनाने की अदभुत कला थी
उसमे,
आशीषों में उठने वाले उसके हाथ
नित नयी प्रेरणा व ऊर्जा से
पूरे आँगन को कर देते थे
अभिमंत्रित,
काश मैं समझ पाता
माँ होने की परिभाषा
और लिख पाता कोई महाकाव्य
अपनी माँ पर।।।।
डॉ अनिल जैन उपहार
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