Saturday, May 2, 2020

ओ कोरोना

ओ कोरोना
माना आज मध्यलोक की
पूरी धरा कुपित है
शापित है
तेरे तांडव से ,
जूझ रही है भारत भूमि
तेरे विकराल रूप से
पर शायद तुझे पता नहीं
ये पुण्य धरा है सन्तों की
जहाँ अच्छे अच्छे प्रलय
हमने रोक दिए है ,सिर्फ
अहिंसा और अपने
मजबूत इरादों से ।
जितना इम्तहान लेना है
ले ले पर याद रखना
हमे अच्छेसे आता है
तुझसे निपटना।
विदेशी समान हमारे यहाँ
ज्यादा दिन नही टिकता
तुझे भी अलविदा होना ही है
अरे-
हम तो विदा भी तुझे हाथ जोड़कर
ही करेंगे।
तेरी विदाई में हमने
कर दिए है खाली चैराहे,सड़कें,
और बाजार
गर हिम्मत है तो तोड़ कर दिखा
हमारे धैर्य को ।
आ ये लोक डाउन तेरा उपहास
किस तरह उड़ा रहा है
पुलिस के जवान और
देवदूत बने ये डॉक्टर
काफी है तेरे लिए
अरे ओ निर्लज्ज हो सके तो
लौट जा अपने देश ।।।

डॉ अनिल जैन उपहार

ओ कोरोना

याद है अबतक कि,
संस्कारों की सड़क के
मुसाफिर थे तुम ।
भौतिकता की अट्टालिका
रास नही आती थी कभी
और ना ही कभी झूठा दम्भ
विचलित कर पाया तुम्हे ।
पाप और पूण्य के खेल में
हर बार भारी होता गया
पलड़ा ,दोगली मानसिकता का
जो तोलना चाहता था
तुम्हारे स्वाभिमान को ।
तुमने हार कहाँ मानी
बस स्वीकार कर लिया
मन का एकाकीपन
सृजन की असीमित संभावनाओ ने
बना लिया तुम्हे आश्रय स्थल,
और तुम
सिखाते रहे ज़माने को
जीवन जीने की कला
हां यही हुनर कोई चुरा नही पाया
तुमसे आज तक ।

अनिल जैन उपहार

कविता

कोरोना सबसे बड़े गुरु निकले तुम ।
,,,,,
माना कि इस कोरोना ने
ले ली कई जिंदगियां
धूल धूसरित कर दिए
कई सपनों को ।
पर ये एक ऐसा पाठ पढ़ा गया
शायद
 जिसकी
कल्पना भी तो नही की थी
किसी ने ।
इंसान समझ रहा था
कि ,ढाबों पर खाये बिना
नही मिट सकती भूख।
जंक फूड के बिना
नीरस है जिंदगी।
बेवजह सड़कों पर घूमना
देता है मज़ा असली जीवन को,
गहराता यह प्रदूषण
देता है गति विकास के पहिये को,
लेकिन तुमने सीखा दिया दुनियाँ
को
बिना इन सबके भी चलती है
ज़िंदगी।
घर मे रहकर
जीती जा सकती है सारी जंग।
मूर्ख बना यह इंसान
यदि समय रहते समझ जाता
तुम्हारी मोन भाषा
तो शायद ये दिन न देखने पड़ते।
मन्दिर बन्द,मस्ज़िद बन्द,
स्कूल बंद,दफ्तर बन्द
कहाँ रुका है जीवन
नही बदली तो बस
आदमी की ओछी मानसिकता।
जिसने बना दिया है गुलाम
बरसों से ।
हा अपनों के साथ रहने का
क्या होता है सुख
कैसे बदल जाता है सब कुछ
समझ गये है सब।
कितनी गज़ब की है
तुम्हारी यह पाठ शाला।
दरवाज़े खिड़कियों को
दे रहे है उलाहना,
कपड़े चिढ़ा रहे है
आलमारियों को ,
शायद यही है औकात
आदमी की ।

डॉ अनिल जैन उपहार