गीतिका लेखनी बेबस

लेखनी बेबस जुबा खामोश है
कैसे कहदूँ कि तू मेरे पास है ।
बिन तेरे कुछ और भाता नहीं
तू है कि लौट कर आता नहीं ।
छंद का अनुप्रास हो तुम
गीत का आगाज़ हो तुम।
ग़ज़ल का उनवान भी तुम
साहित्य का दिनमान भी तुम।
व्याकरण हो तुम ही रस्मों रीत का
हो सुखद अहसास पहली प्रीत का।
फिर भी तेरे होने का हर घड़ी अहसास है
गीत भी तुम ही मेरा ,तू ही मधुर आवाज़ है।

डॉ अनिल जैन उपहार (कॉपीराइट

गीत दुर्दिनों का सफर

दुर्दिनों का सफर तुम क्या जानो
दर्द छालों के हमने सहे है ।
तुमको सब कुछ मिला जिंदगी में
हम अभावों के पाले रहे है ।

सर्द रातों में जलता रहा हूँ
हिमगिरि सा पिघलता रहा हूँ।
ओढ़ इज्ज़त का सर पे दुशाला
ढलते सूरज सा ढलता रहा हूँ।
भोर ने भी कभी ना दुलारा
दूर हमसे उजाले रहे है।

चाहतों ने दिये जब जलाए।
वक़्त ने अपने हाथों बुझाए।
इस कदर बेबसी ने है घेरा
हम जिये भी और जी भी न पाए

ना खुशी ही कभी रास आई
उम्मीदों पर भी पहरे रहे है ।

देहरी के दिये सा जला हूँ
हर कदम खुदही खुद से छला हूँ।
थक न जाऊं सफर में कहीं मैं
बन के बैसाखी लम्बा चला हूँ।

हसरतें भी रही सब अधूरी
सिर्फ तानों के साये रहे है ।


डॉ अनिल जैन उपहार

Sunday, July 26, 2020

गीत मैं उड़ना चाहता हूं

उड़ना चाहता हूं पंख को परवाज़ देना तुम
मेरे हर गीत को अपनी प्रिये आवाज देना तुम।

लगे गर वक़्त जब छलने मेरा आधार बनना तुम।
मेरे सुने से जीवन का हँसी संसार बनना तुम।
विरह के गीत गाऊ तो सुरीला साज देना तुम।

कली तुमको लिखा मैने तो भंवरा जल गया मुझसे।
तुम्हे मैं ज्योत लिख बैठा पतंगा अड़ गया मुझसे।
लिखे जो ख़त तुम्हें मैंने न उनका राज़ देना तुम।
सृजन की तुम हो उपमाएं तुम्ही अनुप्रास जीवन का।
तुम्ही नवगीत हो मेरा तुम्ही हर छंद यौवन का।
सरकते सर से आँचल को वही मुमताज़ देना तुम।

हुआ रोशन तुम्ही से ये हिमाला मेरी शौहरत का।
तुम्ही दिनमान हो मेरी कविता के मुहूरत का।
चढ़ाऊँ अर्घ शब्दों के नया अंदाज़ देना तुम ।
मेरे हर गीत को अपनी मधुर आवाज देना तुम।

Saturday, July 11, 2020

कविता माँ के नाम

तहज़ीब की ग्रंथावली सी हो तुम।
संस्कारों का समृद्ध विद्यालय
पलता है तुम्हारे आँचल में।
कहने को तो आज तक
किसी विद्यालय का मुँह
देखा नहीं तुमने ।
फिर भी
कैसे पढ़ा देती हो तुम
जीवन की जटिल समस्याओं से
लड़ने का सबक।
शायद तुम्हारा माँ होना ही
सबूत है
कि कितना अभ्यास किया होगा
हर दर्द सहने का।
ओ माँ तुम्हे शत शत नमन।

डॉ अनिल जैन उपहार

मुक्तक

रोशनी के दिये फिर जले ना जले।
वक़्त के साथ कोई चले ना चले ।
ये सफ़र ज़िन्दगी का चलो काट ले
राह में तुमसा कोई मीले ना मिले ।

डॉ अनिल जैन उपहार