Monday, July 27, 2020

गीतिका लेखनी बेबस

लेखनी बेबस जुबा खामोश है
कैसे कहदूँ कि तू मेरे पास है ।
बिन तेरे कुछ और भाता नहीं
तू है कि लौट कर आता नहीं ।
छंद का अनुप्रास हो तुम
गीत का आगाज़ हो तुम।
ग़ज़ल का उनवान भी तुम
साहित्य का दिनमान भी तुम।
व्याकरण हो तुम ही रस्मों रीत का
हो सुखद अहसास पहली प्रीत का।
फिर भी तेरे होने का हर घड़ी अहसास है
गीत भी तुम ही मेरा ,तू ही मधुर आवाज़ है।

डॉ अनिल जैन उपहार (कॉपीराइट

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