मुस्कुराई ग़ज़ल नज़रे पढ़ने लगी अधरों ने एक मीठा सा स्वर दे दिया।
वक्त के भाल पर बंदिशे खूब थी
गीत ने प्रीत का हर जखम भर दिया।
माना रुसवाइयों का चलन ओर था तुमने हँसकर सहा हमने हँसकर कहा ।
हर शरारत चिढ़ाती रही रात भर बस सफर बिन तुम्हारे अधूरा रहा।
डॉ अनिल जैन उपहार
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