पिया बसे परदेस बलम से कैसे करूँ मनुहार।
नैया ले चल मोहे उस पार।
सावन बीता बिन सजना के सेज सिसकती रातों में।
अलसायी सी रहती हूं खोयी रहती बातों में।
असुवन के जल से धोती हूँ अपना सब श्रृंगार।
नैया ले चल मोहे उस पार।
बारिश की बूंदों से जलती हृदय पटल की फुलवारी।
बिन तुम्हरे सूखी जाती है नेह सिक्त जीवन की क्यारी।
कोयलिया भी लगी चिढ़ाने अब तो बारम्बार।
नैया ले चल मोहे उस पार।
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