विषय --निर्झर/झरना
नेह निर्झर अब न सूखे सब करें ऐसे जतन।
मन देहरी से विवश लौटे ना कभी प्यासे नयन।
रीत ता ही जारहा संवेदना का अश्रु जल।
लुप्त होने क्यो लगा झरनों का मधुरिम कल कल।
ये उदासी के भंवर कब तक रहेंगे रोक कर।
बाट जोहते थक गए वो प्रीत के अनछुए पल ।
रिश्तों को लगा डसने अब तो मन का देखो खालीपन।
मन देहरी से विवश लौटे ना कभी प्यासे नयन।
अपनापन भी खो गया सम्बन्ध बौने होगए।
स्वार्थ की आंधी चली अपने पराये हो गए।
प्यार के दो बोल को लो वो तरसते उम्र भर।
सिर्फ खुशियाँ बांटने में जिनको सदियों हो गए।
जख्म ऐसे भी मिले जो झेल ना पाए तपन।
मन देहरी से विवश लौटे ना कभी प्यासे नयन।
डॉ अनिल जैन उपहार
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