Wednesday, September 2, 2020

माँ हिंदी कविता

कभी लिखूँ में तुझे रुबाई 
या तुलसी की चौपाई लिखूं।
कभी मीर की ग़ज़ले लिख दूं
या शब्दों की अंगनाई लिखूं।
अनुप्रास तुम ही जीवन का
यमक श्लेष सा सार लिखूं।
कभी लक्षणा कभी व्यंजना
अभिधा का विस्तार लिखूं।
उपमाओं में बांधूं कैसे
नवगीत लिखूं या छंद लिखूं।
तुम कविता हो हर जीवन की
जीवन का अनुबंध लिखूं।
मधुर कामना तुम वसंत की
यौवन का दिनमान लिखूं।
कभी रूपसी कभी प्रेयसी
जायसी का श्रृंगार लिखूं।
वेद ऋचा सी तुम हो पावन
उर अंतर में आ जाओ
मेरे सूने इन अधरों पर
माँ हिंदी तुम छा जाओ।

डॉ अनिल जैन उपहार

No comments:

Post a Comment