दस्तूर
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विपदाओं के गहन तल में
हर बार घिरता हुआ जीवन
तलाश ही लेता है
उम्मीद का उजाला ,
नही हारता यह मन
थकने नही देती है
जिजीविषा,
चीथड़ों में से उघड़ती देह
ढंक लेती है पेट की गरीबी।
उसे याद है ,बेबसी जमाने की।
कुछ ही पलों में तोल दी जाएगी
बदचलनी के तराजू में उसकी
कोमल देह।।।।
डॉ अनिल जैन उपहार
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