ओ बदरा।।।माना इंसानी मानसिकता केनीचे गिरने की पराकाष्ठा सेआहत हो तुम ,गिरगिट की तरह रंग बदलते चेहरों के छल को जानते हो तुमफिर भी आस लगाए बैठी न जाने कितनी उम्मीदों के लिएतुमको बरसना ही होगाआना ही होगाप्रकृति के प्लेटफार्म परहरियाली की ट्रेन लेकर।डॉ अनिल जैन उपहार
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