Monday, March 21, 2022

तुम लौट आओ।।(कविता)

-----शायद तुम लौट आओ ------
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मन का मरुस्थली सन्नाटा तोडती 
तुम्हारी यादें 
घोल देती थी 
देह की हर दस्तक में मिठास ।

पलकों पर सजे सिंदूरी स्वप्न ।
बार बार देते निमंत्रण 
मन देहरी पर 
भावनाओं के 
अक्षत चढाने कों ।

संस्कारों की सड़क के मुसाफिर सा
तुम्हारा बेखोफ चलना ।
तहजीब की ग्रंथावली के 
कोमल किरदार को 
सलीके से निभाना ।

पढ़ा देना बातों ही बातों में 
मर्यादा का पाठ ।
विरदा वलियों का संवाद ।
जिसने रिश्तों के रंग मंच पर 
अपना अभिनय 
बखूबी करना सिखाया ।

अचानक-
वक़्त की आई तेज आंधी ने 
सब कुछ 
बिखेर कर रख दिया ।
और धूल धुसरित कर दिया 
उन सभी रिश्तों कों ,
जिनकी छाँव में 
हमने जीवन के सतरंगी सपनों को 
बुना था ।

कहने कों अब नहीं हो 
साथ मेरे ।
पर आज भी अहसास ज़िन्दा है 
मन के किसी कोने में ।

तुम्हारा शांत नदी सा बहना ।
लहरों सा अठ खेलियाँ करना ।
और 
अचानक छोड़ कर चल देना ।

मेरे गीत और छंद सूने है 
तुम्हारे बगेर ।
फिर भी विश्वास है कि -
तुम लौट आओगे 
और 
अधरों पर गीत बन 
बिखेर दोगे 
अपने माधुर्य की ताज़गी ।
मै अपने गीत और छंद 
तुम्हारे नाम करता हूँ ।
श्रध्दा की पावन प्रतिमा 
मै तुम्हें प्रणाम करता हूँ ।

--------अनिल उपहार -------

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