Thursday, November 10, 2022

कविता

शब्दों के सागर कों 
मन जब जब खंगालने लगा 
हर बार 
तेरा ही अक्स उभर आया 
कभी कविता 
कभी गज़ल 
तो कभी 
छंदों  की पायल में 
तुझे ही खनकता पाया 
मेरे ये गीत मेरे नहीं 
तेरे कोमल स्पर्श का 
कोमल अहसास  है
तन भले ही हो पराया 
पर मन तुम्हारे पास है 
तभी तो 
मेरे अधरों पर आज भी 
स्वर तुम्हारे गूंजते है
दर्द तो बस गीत रचता है 
तू ही तो है जो मेरे हर गीत में 
बसता है 
बिन तुम्हारे  संकलन  
आज तक अधुरा है
न कविता पूरी होसकी 
न गीत पूरा हो सका है ...

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@अनिल उपहार

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