Friday, December 9, 2022

कविता ,(रिश्ता)

भावनाओं के सेतु से तुम्हारा 
बैखोफ गुज़र जाना ।
और कदम दर कदम
छोड़ जाना ऐसे निशां 
जिन पर लिखे को 
कोई बांच नही सकता ।
नफरत की अंधी खाई को 
कोई पाट नही सकता ।

शायद ये फितरत नही तुम्हारी 
सिर्फ फ़िज़ा में छाया वो धुंआहै 
जो देखने नही देता 
तुम्हारी आँखों कों 
रिश्तों की सच्चाई ।

तभी तो उतर आते है 
इन आँखों में संशय के ज्वार ।
और लगा देते है 
अपनी परम्परागत मुहर
पराये को पराया समझते रहने की ।

---;;डॉ अनिल जैन उपहार

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