तुम बिन,,,,,,,,
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बहुत बेदर्द आँखें है बड़े बेजार मंजर है ।
मेरी पलकों के पीछे पलरहे लाखों समंदर है ।
ज़रा ठहरो मेरी सुनलो कि
तुम बिन जी नही सकते ।
अश्कों के समंदर को
तन्हा पी नहीं सकते
तो आजाओ मुझे आजाद करदो अपनी चाहत से
सिहर उठता है मन दरवाजे की हल्की सी आहट से
बहुत से कारवां आते हे लेकिन तुम नही आते
तुम्हारे बिन ये सावन के हमे झूले नही भाते ।
अभी भी वक्त है आओ लिखो अधरों पे सावन तुम
करदो तन मेरा चन्दन ज़रा होले से छूकर तुम ।
----------------अनिल उपहार ------