अंजानो आरती के स्वर यहाँ हर दिन मचलते है । चरागों के ही साये रात के तेवर बदलते है । रहें होंगे उजाले कैद महलों में कहीं पहलें यहाँ जुगनू भी ऐसे है जो सूरज से निकलते है । अनिल उपहार।।।।।।
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