Wednesday, June 1, 2016

मुक्तक

अंजानो आरती के स्वर यहाँ हर दिन मचलते है ।
चरागों के ही साये रात के तेवर बदलते है
। रहें होंगे उजाले कैद महलों में कहीं पहलें
यहाँ जुगनू भी ऐसे है जो सूरज से निकलते है ।
अनिल उपहार।।।।।।

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