दम्भ जब अपनी हद से लगता है गुजरने वो नही देखता ऊँच नीच अपना पराया । वो तो बस चाहता है हरदम मर्यादा की दहलीज़ को लांघना और कर देना चाहता है साबित अपनी झूटी दलीलों से खुद का ही हलफनामा ।
टांग कर सच्चाई को सलीब पर ।
अनिल उपहार
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