निकल कर चाह आँखों से अश्रु बन बही होगी ।
विषमता मन की सांसों ने धड़कन से कही होगी ।
सियासत के जटिल है दाव रिसते घाव कहते है
हमारी खेल नीति में कमी कुछ तो रही होगी ।
अनिल उपहार ।।।।
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