मन जब जब
पवित्रता का आचमन
करने लगा
तुम्हारे सवालों ने
उसे कटघरे में
ला खड़ा कर दिया ।
बड़ी अज़ीब दासतां है
ये रिश्तों की ।
फ़िज़ा में घुलता ज़हर
अब रिश्तों को भी
निगलने लगा है ।
क्या कोई निश्छल नही हो सकता ????
बस यही प्रश्न घेरे है मुझे
अनुत्तरित प्रश्न समाधान चाहते है
तुमसे
दोगे न तुम????
अनिल जैन उपहार
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