Thursday, May 11, 2017

कविता (समाधान)

मन जब जब
पवित्रता का आचमन
करने लगा
तुम्हारे सवालों ने
उसे कटघरे में
ला खड़ा कर दिया ।
बड़ी अज़ीब दासतां  है
ये रिश्तों की ।
फ़िज़ा में घुलता ज़हर
अब रिश्तों को भी
निगलने लगा है ।
क्या कोई निश्छल नही हो सकता ????
बस यही प्रश्न घेरे है मुझे
अनुत्तरित प्रश्न समाधान चाहते है
तुमसे
दोगे न तुम????

अनिल जैन उपहार

No comments:

Post a Comment