सरगोशियां करती रही
खामोशियाँ
रात भर
भेद जानने को आतुर
रात का अंतिम प्रहर ।
जल रहा है अंतस का
पोर पोर ।
सावन की बूंदों ने
डाल दिया हो घी जैसे ।
उदास मन
भीगते नयन
मन की दहलीज के
सूने पन को ताकती
अनचाही आहट की प्रतीक्षा में ,
बिस्तर की सिलवटों ने
कर दिए है दर्ज
अपने बयान ।
मन मुजरिम सा
काट रहा है सजा
अपने निर्दोष होने की ।
बिन तेरे,,,,,,,,
अनिल जैन उपहार
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