Wednesday, November 29, 2017

मुक्तक (सबक)

माना कि ज़िंदगी की दौड़ में बढ़ गए हो तुम ।
और शोहरत की ऊंचाई चढ़ गए हो तुम ।
माँ बाप की खिदमत का सबक सीखा नही तुमने
कैसे मान लें कि सारे सबक पढ़ गए हो तुम ।

अनिल उपहार

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